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मायावती, बौद्ध, दलित नायकों और बीएसपी की मूर्तियों पर पर्दा एक राष्ट्र-कलंक

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मायावती, बौद्ध, दलित नायकों और बीएसपी की मूर्तियों पर पर्दा एक राष्ट्र-कलंक Empty मायावती, बौद्ध, दलित नायकों और बीएसपी की मूर्तियों पर पर्दा एक राष्ट्र-कलंक

Post  nikhil_sablania on Wed Jan 11, 2012 6:50 am

जब से मायावती की मूर्तियाँ खड़ी हुई है देश में बेतुका हाहाकार मच गया. क्या आप अपने घर में अपनी तस्वीर नहीं लगते और अगर आप किसी राज्य के प्रमुख हैं तो क्या आप अपनी तस्वीर या प्रतिमा नहीं लगवा सकते? देश में बीएसपी को तीसरे नंबर पर सबसे ज्यादा बहुमत मिला तो क्या देश में सिर्फ कांग्रेस को ही अधिकार है कि वह सिर्फ अपने ही नेताओं की प्रतिमा लगवाये?

दलितों के खून को चूस-चूस कर नेहरु के खानदान ने भारत की सम्पति लूटी और लुटवा कर देश के दलालों को सौंप दी पर तब इन्होने अपने कुकर्मों पर तो परदे नहीं डाले पर आज जब देश का पिछड़ा वर्ग उठ कर खड़ा हुआ है तो उसके सम्मान को प्रदर्शित करने वाली मूर्तियों को ढक कर इन्होने न सिर्फ भारत का अपमान किया है बल्कि भारत के प्रजातंत्र पर एक ऐसा दाग छोड़ा है जिससे देश का इतिहास स्वर्णिम नहीं बल्कि काले अक्षरों में लिखा जाएगा.

मायावती पर आरोप लगाया जा रहा है कि मूर्तियों में उसने देश की जनता का पैसा लगाया. दूसरी पार्टियाँ जो पैसा चुनाव में लगाती है क्या वह विदेशी है? क्या देश में रह रहे वह बीस प्रतिशत लोग जो बाकियों से अनुपात में अत्याधिक अमीर हैं और सरकार की असफल नीतियों का फायदा उठा कर देश का धन काबू में करके जो एशों-आराम की जिंदगी बिताते हैं क्या वह जनता का पैसा नहीं है? देश के बाकी नेता और नौकरशाह जिस ऐशोआराम को भोगते है क्या वह जनता का पैसा नहीं है?

चुनाव आयोग के सहारे देश में उस तीसरी पार्टी का दमन किया जा रहा है जिसकी कि देशवासियों को बरसों से तलाश थी. मायावती केवल दलित ही नहीं बल्कि देश की गरीब और बेसहारा जनता की पुकार है जो कि उन्हें अपने नेता के रूप में देखती है. मायावती, बौद्ध, दलित नायकों और बीएसपी की मूर्तियों पर पर्दा आज देश के सामने एक दमनकारी देशद्रोही की चुनौती है. अगर आज देश इस चुनौती के आगे झुक गया तो इस देश का रहा सहा सर्वनाश निश्चित है.

जब, जिसे हिन्दुस्तान कहते हैं, वहाँ सिर्फ सौ साल पहले तक अगर कोई अछूत (दलित) जनेऊ धारण करे तो उसे हिन्दुओं द्वारा ज़िंदा जला दिया जाता था, पेड़ पर बांध कर कोडों से मारा जाता था, मंदिर में प्रवेश करने पर जान से मार दिया जाता था, भगवानों के भजन में शामिल होने के लिए पीटा जाता था, पानी के लिए प्यासा तरसाया जाता था, जिसका नाम तक भद्दा रखा जाता था, ऐसे हिन्दुस्तान में अछूतों की मूर्तियाँ और राजनैतिक दल कैसे ज़िंदा रह सकते हैं?

पिछले चुनावों में मायावती ने उन हिन्दुओं से यह अपील की थी कि वें बीएसपी को सिर्फ दलितों की ही पार्टी न समझे और चाहें तो हाथी को हिन्दुओं का गणेश मान कर चिन्ह लगाए और उन्हें उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा वोट दे कर हिन्दुओं ने दलितों के साथ मिल कर अपना नेता बनाया. क्या चुनाव आयोग का हाथी की प्रतिमाओं को ढकने का यह कदम हिन्दुओं को ठेस नहीं पहुंचाएगा?

जब अफगानिस्तान में तालीबनियों द्वारा बुद्धिस्ट मूर्तियाँ तोड़ी गयी थी तो भारत के हिन्दुओं ने मुसलमानों को कोसते हुए खूब हो हल्ला मचाया था. पर आज भारत में ही एक तरफ कांग्रेस अपने नेता राहुल और दिगविजय के जरिये बुद्धिस्ट स्मारकों को निशाना बना रही है तो बीजेबी के नेता वरुण भी इन्हें निशाना बना चुके हैं. ऐसे में हिन्दू किस मुँह से मुसलमानों को बुरा कहते हैं जब की वह खुद ही अपनी बौद्धिक सम्पदा पर प्रहार कर रहे हैं?

अभी दलित प्रेरणा स्थल और दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के महानायकों की मूर्तियाँ खड़ी भी नहीं हुई थी की ब्राहमणवादियों ने बनने से पहले ही उनके पतन की भूमिका बंधनी शुरू कर दी. आज तक जिसने देश में अनगिनत धार्मिक स्थानोंओं पर उंगली नहीं उठाई की जहाँ से मानव की पराधीनता की शुरुआत होती है और जहाँ से उसे उल्लू बना कर पैसा उगाया और आपस में लड़ाया जाता है, उन्होंने मानव-इतिहास के उन नायकों को निशाना बनाया जिन्होंने मानवीय-संघर्ष में सबसे पिछड़े और दबे कुचले मानव का उत्थान किया.

६५० करोड़ का दलित प्रेरणा स्थल क्या बना की ब्रहमाणवादियों की नींद तक उड़ गयी. पैसे और मीडिया के ज़ोर पर वह मायावती को बदनाम करने में लग गए. अगर आबादी के हिसाब से देखें तो देश में लगभग ६० प्रतिशत दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग है. प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से सरकार की तरफ से मान लें कि दस रुपया चला भी गया तो क्या तूफ़ान खड़ा हो गया? ऐसा तूफ़ान तब नहीं खड़ा हुआ जब सिर्फ दिल्ली में ही दलितों के ८०० करोड़ रूपये कोमन्वेल्थ खेलों में फूंक दिए गए.

६५० करोड़ रूपये की दलित, आदिवासी और बहुजन मूर्तियों और स्मारकों पर प्रत्येक बहुजन के गर्व पर मात्र १० रुपया गया है जो उस झूठे धार्मिक, फ़िल्मी और खेल जगत पर खर्च हुए धन से बहुत कम है जिससे राष्ट्र की सम्पति चंद हाथों में चली जाती है. देश के धन्ना सेठों और मोटी कमाई वाले जो झटके में इससे कई गुना रकम लोगों को बेवकूफ बना कर लूट लेते हैं और ऐशों आराम के लिए बेहिसाब महल, कोठियाँ अदि बनवाते हैं, उससे तो इस राष्ट्रीय धरोहर में पैसा लगाना ही वाजिब है जिससे कम-से-कम देश की जनता का मानवतावादी इतिहास तो लिखा जाएगा.
- निखिल सबलानिया


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