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जाती की सच्चाई - निखिल सबलानिया

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Post  nikhil_sablania on Mon Oct 27, 2014 1:57 pm

आज भारत में जाती की समस्या एक वीभत्सस रूप ले चुकी है। जहाँ दुनिया आगे बढ़ रही है वहीं भारत में लोग अभी भी रूढ़िवादी बेड़ियों में जकड़े हुए है। लोग अभी भी अपनी ही जाती में विवाह करते हैं और इसमें अपनी शान समझते हैं। परन्तु प्राचीन भारत में जाती जैसी कोई चीज नहीं थी और वर्ण व्यवस्था स्थाई नहीं थी। डॉ अम्बेडकर अपनी एक अधूरी पुस्तक 'ब्राह्मणवाद की जीत' में यह लिखते हैं कि पहले जाती व्यवस्था स्थाई नहीं थी। पहले वर्ण व्यवस्था थी और वर्ण व्यवस्था कोई स्थाई नहीं थी और किसी भी वर्ण की महिला दूसरे वर्ण के पुरुष के साथ स्वेच्छा से विवाह कर सकती थी। परन्तु 165 वी ईसापूर्व में एक ब्राह्मण पुष्यमित्र ने मौर्या वंशज के अंतिम राजा का वद्ध कर दिया और खुद राजा बन बैठा और सुमित भार्गव नमक ब्राह्मण से मनुस्मृति की रचना करवाई। उसका उद्देश्य ब्राह्मणों को असीमित अधिकार देना था क्योंकि उससे पहले के मौर्यकाल में बौद्ध धम्म के प्रभाव से भारत का समाज एक हो चुका था और वर्ण व्यवस्था क्षीण हो चुकी थी। तब शूद्र भी बौद्ध मुनि बन सकता था जिसका दर्जा किसी ब्राह्मण मुनि से कम न था। पर मनुस्मृति की रचना से पूर्वकाल में वर्ण भी स्थाई नहीं था और उपनयन का संस्कार गुरु द्वारा किया जाता था। इस उपनयन के बाद ही गुरु द्वारा उसके शिष्यों को वर्ण दिया जाता था और एक ब्राह्मण के बच्चे को शूद्र का वर्ण भी मिल सकता था। पर पुष्यमित्र ने मनुस्मृति में इस नियम को बदल दिया और उपनयन का अधिकार पिता को दे दिया और साथ ही में उपनयन की आयु सीमा भी कम कर दी। इससे यह हुआ कि पिता के वर्ण की वजह से बच्चे का वर्ण स्थिर हो गया। इसके साथ ही मनुस्मृति में यह नियम बनाया गया कि शूद्र को शिक्षा नहीं दी जाएगी और उसका उपनयन भी नहीं होगा। इसके अलावा विवाह के नियम भी पुष्यमित्र ने बदल दिए क्योंकि उसका उद्देश ब्राह्मणों को असीमित अधिकार देना था और इसके लिए उसे भारत से समाज को विभाजित करना था। सो एक तरफ तो उसने वर्णों को स्थायी बनाया और दूसरी तरफ समाज को जातियों में बांटा। जातियों में बांटने की आवश्यकता इसलिए थी क्योंकि इससे ही ब्राह्मणों के विरुद्ध किसी क्रांति को रोका जा सकता था। विवाह के सम्बन्ध में प्राचीन नियमोँ को बदला गया। ब्राह्मण को अधिकार दिया गया कि वह किसी भी वर्ण की लड़की के साथ विवाह कर सकता था पर शूद्र केवल शूद्र लड़की के साथ और क्षत्रिय पुरुष क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र लड़की के साथ और वैश्य पुरुष वैश्य और शूद्र लड़की के साथ। मनुस्मृति से पहले बच्चे का जन्म पिता के वर्ण पर आधारित होता था पर मनुस्मृति ने इसे बदल कर माँ पर आधारित कर दिया जिससे कि यदि पुरुष ब्राह्मण है और महिला शूद्र तो भी बच्चा शूद्र ही होगा। ऐसा इसलिए किया गया ताकि इस डर से समाज विभाजित रहे। किसी के द्वारा मनुस्मृति के इन नियमों का कड़ाई से पालन न करने पर उसे वर्ण से बाहर दर दिया जाता और ऐसे जाती में से जाती बनती चली गयी। बाहर किये गए लोगों के साथ उठना-बैठना, खाना-पीना मनुस्मृति के नियमों द्वारा अवैध कर दिया गया जिससे कि छुआछूत और बढ़ गयी। इसके लिए मनुस्मृत में लिखा गया कि ऐसा करनेवाला ब्रह्मराक्षस बनेगा। फिर भी जाती के विधुर पुरुष और विधवा महिला एक समस्या थे जिसके लिए मनुस्मृति ने कुछ इस प्रकार नियम बनाए जिससे कि समाज जातिगत तौर पर विभाजित ही रहे। महिला या तो ताउम्र विधवा रहे या सती हो कर अपने पति की चिता पर जल कर मर जाए। सती का मनुस्मृति में सीधा विवरण नहीं है बल्कि टेढ़े शब्दों में है पर कात्यायन ने इसके बारे में कहा है। इससे एक जाती की विधवा महिला दूसरे जाती के पुरुष के साथ सम्बन्ध नहीं बना सकती थी। पुरुष को जलाना इसलिए जरुरी नहीं समझा गया क्योंकि उससे ही काम लेने थे। विधुर किसी दूसरी जाती की महिला से विवाह न कर ले इसके लिए मनुस्मृति में नियम बनाए गए की एक 34 साल का पुरुष 12 साल की बच्ची से साथ विवाह कर सकता है। पुरुष और लड़की की विवाह आयु में इतना अंतर प्राचीन काल में कभी नहीं था। मनुस्मृति ने एक नियम और जोड़ दिया कि शादी लड़की के यौवनकाल आने से पहले कर देनी चाहिए। इसी से बाल विवाह जैसी कुरीति ने जन्म लिया और इसी नियम से यह हाल हो गया कि 60 वर्ष का पुरुष यदि 10 वर्ष की बच्ची से विवाह करता था तो वह विवाह मनुस्मृति के नियम के कारण वैद्य था। तो इस प्रकार भारत का समाज जातिगत तौर पर बंटता गया। वर्ण व्यवस्था जाती में बदल गई। जो जाती के नियम नहीं मानता जो कि मनुस्मृति पर आधारित थे उसे जाती से बाहर कर दिया जाता और जाती में से जाती निकलने के साथ-ही-साथ छूआछूत भी बढ़ती चली गयी। इससे निचली जाती के पुरुषों को महिलाएं मिलनी बंद हो गई क्योंकि निचली जाती की महिलाओं का ऊँची जाती के पुरुषों से विवाह तो वैद्य कर दिया गया पर ऊंची जाती की महिलाओं से निचली जाती के पुरुषों का विवाह अवैद्ध माना गया। इससे बहुत सी निचली जातियाँ लुप्त हो गई अर्थात बहुत से निचली जाती के पुरुष अपनी संताने पैदा नहीं कर पाए। आज भी अधिकांशतर दलित जाती की लड़कियाँ ही ऊँची जाती के ब्राह्मण, वैश्य या क्षत्रिय लड़कों से विवाह करती है पर ऊँची जाती की लड़कियाँ दलित लड़कों से विवाह नहीं करती। और दलितों में भी जो खुद को ऊंची जाती का मानते हैं उन जातियों की लड़कियाँ भी दलितों में भी निचली जाती के लड़कों से विवाह नहीं करती पर इसका विपरीत ही देखने को मिलता है। भारत का समाज ऐसा टूटा कि फिर छोटे-छोटे राजाओं ने भी भारत पर अपना हाथ साफ किया और भारत गुलामी की जंजीरों में खींचता चला गया। अब यदि भारत को मनुस्मृति की जंजीरों से बाहर लाना है तो उसे बौद्ध धम्म का रास्ता अपनाना पडेगा क्योंकि प्राचीन काल में भी बौद्ध धम्म अपना कर ही भारतवासी एक मजबूत कौम बने थे और मजबूत देश बना था और साथ-ही-साथ विवाह के मामलों में जाती को विवाह का आधार बनाना बंद करना पड़ेगा। डॉ अम्बेडकर लिखते है कि इसी से भारत में एकता बढ़ेगी और लोग एक दूसरे के करीब आएँगे।
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